ब्रह्म पुराण
ब्रह्म पुराण ब्रह्म पुराण को हिंदू धर्म के १८ महापुराणों में से 'प्रथम' स्थान प्राप्त है, इसी कारण इसे 'आदि पुराण' भी कहा जाता है। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, देवताओं के वंश, और तीर्थों का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। यहाँ ब्रह्म पुराण का विस्तृत विवरण दिया गया है: १. संरचना और आकार ब्रह्म पुराण में कुल २४६ अध्याय हैं और श्लोकों की संख्या लगभग १०,००० से १३,००० के बीच मानी जाती है। इसके वक्ता स्वयं ब्रह्मा जी हैं, जिन्होंने दक्ष प्रजापति को इसका ज्ञान दिया था। २. मुख्य विषय-वस्तु ब्रह्म पुराण को मुख्य रूप से पाँच भागों (लक्षणों) में विभाजित देखा जा सकता है: सर्ग (सृष्टि): ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई। प्रतिसर्ग (प्रलय और पुनर्जन्म): जगत का विनाश और फिर से निर्माण। वंश: देवताओं, ऋषियों और राजाओं की वंशावली। मन्वंतर: विभिन्न कालखंडों (युगों) और उनके मनु का वर्णन। वंशानुचरित: प्रमुख राजवंशों (सूर्यवंश और चंद्रवंश) का इतिहास। ३. प्रमुख वर्णन और कथाएँ क. तीर्थों का महत्त्व (गौतमी महात्म्य) ब्रह्म पुराण का एक बहुत बड़ा हिस्सा गोदावरी नदी और उसके तट पर स्थित तीर्थों को समर्पि...